Bhuchar Mori

Bhuchar Mori
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Battle of Bhuchar Mori

Bhuchar Mori is a plateau and historic site about two kilometres northwest of Dhrol, a town about 50 kilometres north of Rajkot, Gujarat, India. This place is known for Battle of Bhuchar Mori. This battle is famous history of Rajputs. You can read this story in Hindi in this page.

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Bhuchar Mori History in Hindi

भारत वर्ष एक ऐसा देश हे जिसमे मान मर्यादा शरणागति संस्कार और सभी लक्षण एक साथ दीखते हे। राजपूतो ने इस भूमि को अपने रक्त से सींचा हे। अपने धर्म और प्रजा के हित के लिए बलिदान दिए हे। आज सौराष्ट्र प्रांत के एक ऐसे ही वीर की बात हे जिसने शरण में आये हुए अहमदावाद के सुबा को बचाने के लिए अपने प्राण की आहुति दी। नवानगर जो आज जामनगर कहलाता हे वहा की यह बात हे।

अहमदावाद मुस्लमान रजा ओ के हाथ में चला गया था। वहां पर दिल्ली की और से सुबा राज चला रहा था। अकबर का दुधभाई अज़ीज़ कोकाह अहमदाबाद की सत्ता पर आरूढ़ होने आया था। सूबे को मारकर वह गद्दी पर बेठना चाहता था। पर अहमदाबाद का सूबा भाग निकला, नवानगर के जाम के पास शरण माँगा। नवानगर के राजवी जाम छत्रसालजी लोकबोलि में वे जाम सताजी के नामसे प्रख्यात थे। जाम सताजी ने उसे शरण में लिया। अज़िज़ कोकाह ने जाम से उसे सपने को कहा पर शरणागत को सौपना राजपूती धर्म और संस्कार से खिलाफ हे। अतः उन्होंने सूबे को न सपने का निर्णय कर युद्ध की पूर्ण तैयारी की। दिल्ली की फौज अज़ीज़ कोकाह के नेतृत्व में सौराष्ट्र पर कब्ज़ा करने हेतु आ खड़ी हुई। इतनी बड़ी सेना से अपने राज्य को बचने के लिए जाम सताजी ने ध्रोल के पास “भूचर मोरी” के मैदान में युद्ध करने का निर्णय लिया। जाम सताजी ने मित्रो को युद्ध में आने का न्योता दिया।

जूनागढ़ से बाबी की सेना आई, खरेडी-वीरपुर से लोमो खुमाण अपनी सेना समेत आया, भुज राव गोडजी ने अपनी सेना भेजी, मेहरामनजी आये। दिल्ली की फौज की बरोबरि में जाम संताजी ने अपनी फौज इकट्ठी की। अज़ीज़ कोकाह ने एक बार फिर युद्ध के बदले सूबे को सोपने का कहा पर जाम सताजी अडग राजपूती पर बने रहे। युद्ध शुरू हुआ, चारोंओर मारकाट होने लगी, राजपूतो के शिर गिरे और धड़ रणमेदान में हाहाकार मचाने लगे, मुसलमान सेना में भंग पड़ा, राजपूत योद्धा गाजरमुली की तरह दुश्मनो को काटने लगे। हर हर महादेव की गूंज रणमेदान में तीव्र होने लगी, आभामंडल में गिद्ध वगेरह पंछी चक्कर काटने लगे, शूरवीरो के रक्त से रणजोगणी अपने खप्पर भरने लगी, महादेव अपनी रुण्डमाला के लिए मस्तक लेने लगे। पर राजपूतो का समय बुरा चल रहा था। अज़ीज़ कोकाह जाम सताजी से समजोता करने ही वाला था यह बात लोमा खुमाण और बाबी को पता चली तब उन्होंने सोचा की अगर जाम जित गए तो अपने राज्य संकट में पड जायेंगे, इस लिए उन दोनों ने अज़ीज़ को सन्देशा भिजवाया की हम तुम्हारे साथ हे।

युद्ध का अंत निश्चित था। जाम सताजी जितने ही वाले थे की लोमो खुमान और जूनागढ़ बाबी ने अपनी सेना अज़ीज़ के साथ मिला दी, और इस तरफ जाम की सेना कम हो गयी, जाम की विजय पराजय में बदलने लगी। मंत्री ने जाम को अपने राजपरिवार की रक्षा करने हेतु नवानगर वापस भेजा, यह बात जाम सताजी के पुत्र कुँवर अजाजी को पता चली तब उनका विवाह हो रहा था। लग्न के फेरे हो रहे थे। फेरे को बिच में ही छोड़ कुँवर अजाजी और लग्न में सम्मिलित 500 मेहमानो के साथ रणमैदान में आये। और रनमेदान में घमासान मचा दिया। अपने राजकुँवर को वीरता से लड़ते देख राजपूतो में हर्ष और वीरता का संचार हुआ, सामान्य से सामान्य सैनिक भी ज्यादा से ज्यादा दुश्मनो को काटने लगे।

कुँवर अजाजी ने हाथी पर आरूढ़ अज़ीज़ को देखा, देखते ही अपने अश्व को कूदाकर हाथी के दन्त पर अश्व ने अपने पैर टिकाये और अजाजी ने अपने भाले से प्रहार किया अज़ीज़ कोठी में छिप गया और बाख गया, लेकिन उसके अंगरक्षकों ने अजाजी पर वार किया, अजाजी के देह में एक साथ कई भाले के वार से वे गिरे और वीरगति को प्राप्त हुए। गोपाल बारोट ने अजाजी से अभी विवाह पूर्ण नही हुआ था उस राजपूतानी सुरजकुवरबा को अजाजी के वीरगति का समाचार दिया। सुरजकुवरबा को सत चड़ा, जय अम्बे जय आशापुरा का घोष किया, रथ में सवार होकर रणमैदान में आये। मुस्लिमो ने उनका रथ रोकने का प्रयास किया। पर ध्रोल के जाडेजा भायात ने आकर मुस्लिमो को समजाया की यह रिवाज हे। कुटुम्बी अनबन की वजह से ध्रोल भायातो ने युद्ध में हिस्सा नही लिया था। पर जब सुना की रानी का रथ रोका तब वे आपसी भेद भुलाकर मुस्लिमो को समजाने आये। और रानी सुरजकुवरबा अजाजी का मस्तक अपनी गोद में रखकर सती हुये। इस तरह भूचर मोरी का युद्ध सौराष्ट्र का पानीपत कहलाया, गुजरात के इतिहास बड़े बड़े युद्ध बहोत हुए हे लेकिन यह युद्ध सबसे अंतिम बड़ा युद्ध प्रख्यात हुआ।

जाम सताजी ने एक शरणागत को आश्रय देकर राजपूती धर्म को बचाया और दिल्ली जितने बड़े राज्य से दुश्मनी की, कुँवर अजाजी ने छोटी उम्र में ही बड़े बड़े राजपूतो जितना नाम प्राप्त कर वीरगति स्वीकारी, सुरजकुवरबा ने अजाजी की चिता में सती होकर राजपूतानी यो की फर्ज बजाई, ध्रोल के जाडेजाओ ने आपसी फुट भुलाकर सुरजकुवरबा की मुस्लिमो से रक्षा की।
इतने लक्षण सिर्फ राजपूतो में ही देखने मिलते हे।

Story of Bhuchar Mori Bhanji Dal Jadeja

आज हम एक ऐसे वीर योद्धा भान जी दल जाडेजा के बारे में बताने जा रहे है जिसने अपने राज्य पर बुरी नजर रखनेवाले मुगलों को गाजर मूली की तरह काटा | इतना ही नहीं तो उनका नेतृत्व करने वाले अकबर को भागने पर मजबूर कर दिया ! लेकिन दुर्भाग्य देश का कि नई पीढी को इस वीर योद्धा के बारे में पढाया और सुनाया ही नही गया ! भान जी दल जाडेजा ने अकबर को बुरी तरह परास्त किया और उसे भागने पर मजबूर कर दिया और साथ ही साथ उसके 52 हाथी, 3530 घोड़े पालकिया आदि अपने कब्जे में ले लिए !

1576 ईस्वी में मेवाड़,गोंड़वाना के साथ साथ गुजरात भी मुगलो से लोहा ले रहा था | गुजरात में स्वय अकबर और उसका सेनापति कमान संभाले थे ! अकबर ने जूनागढ़ रियासत पर 1576 ईस्वी में आक्रमण करना चाहा तब वहां के नवाब ने पडोसी राज्य नवानगर (जामनगर) के राजा जाम सताजी जडेजा से सहायता मांगी ! क्षत्रिय धर्म के अनुरूप महाराजा ने पडोसी राज्य जूनागढ़ की सहायता के लिए अपने 30000 योद्धाओ को भेजा जिसका नेतत्व कर रहे थे नवानगर के सेनापति वीर योद्धा भान जी दल जाडेजा !

सभी योद्धा देवी दर्शन के पश्चात् तलवार शस्त्र पूजा कर जूनागढ़ की सहायता को निकले, पर माँ भवानी को कुछ और ही मंजूर था ! उस दिन जूनागढ़ के नवाब ने अकबर की विशाल सेना के सामने लड़ने से इंकार कर दिया व आत्मसमर्पण के लिए तैयार हो गया ! नवानगर के सेनापति ने वीर भान जी दल जाडेजा को वापस अपने राज्य लौट जाने को कहा ! इस पर भान जी और उनके वीर योद्धा अत्यंत क्रोधित हुए ! भानजी जडेजा ने सीधे सीधे जूनागढ़ नवाब को कहा “क्षत्रिय युद्ध के लिए निकला है तो या तो जीतकर लौटेगा या फिर रण भूमि में वीर गति को प्राप्त करेगा” !
वहां सभी वीर जानते थे की जूनागढ़ के बाद नवानगर पर आक्रमण होगा ही, इसलिए सभी वीरो ने फैसला किया कि वे बिना युद्ध किये नही लौटेंगे ! अकबर की सेना लाखो में थी ! उन्होंने मजेवाड़ी गाँव के मैदान में अपना डेरा जमा रखा था ! भान जी जडेजा ने मुगलो के तरीके से ही कुटनीति का उपयोग करते हुए आधी रात को युद्ध लड़ने का फैसला किया !

सभी योद्धा आपस में गले मिले फिर अपने इष्ट देव का स्मरण कर युद्ध स्थल की ओर निकल पड़े ! आधी रात हुई और युद्ध आरम्भ हुआ ! रात के अँधेरे में हजारो मुगलो को काटा गया ! सुबह तक युद्ध चला, मुगलो का नेतृत्व कर रहा मिर्ज़ा खान और मुग़ल सेना अपना सामान छोड़ भाग खड़ी हुयी !

हालांकि अकबर इस युद्धस्थल से कुछ ही दूर था, किन्तु उसने भी स्थिति की गंभीरता को भांपकर पैर पीछे खींचने में ही भलाई समझी | वह भी सुबह होते ही अपने विश्वसनीय लोगो के साथ काठियावाड़ छोड़कर भाग खड़ा हुआ !

नवानगर की सेना ने मुगलो का 20 कोस तक पीछा किया ! जो हाथ आये वो मारे गए ! अंत में भान जी दल जाडेजा ने मजेवाड़ी में अकबर के शिविर से 52 हाथी 3530 घोड़े और पालकियों को अपने कब्जे में ले लिया ! उस के बाद यह काठियावाड़ी फ़ौज नवाब को उसकी कायरता की सजा देने के लिए सीधी जूनागढ़ गयी ! जूनागढ़ किले के दरवाजे उखाड दिए गए ! ये दरवाजे आज जामनगर में खम्बालिया दरवाजे के नाम से जाने जाते है और आज भी वहां लगे हुए है !

बाद में जूनागढ़ के नवाब को शर्मिन्दिगी और पछतावा हुआ उसने नवानगर महाराजा साताजी से क्षमा मांगी और दंड स्वरूप् जूनागढ़ रियासत के चुरू ,भार सहित 24 गांव और जोधपुर परगना (काठियावाड़ वाला) नवानगर रियासत को दिए !

कुछ समय बाद बदला लेने की मंशा से अकबर फिर 1639 में आया किन्तु इस बार भी उसे “तामाचान की लड़ाई” में फिर हार का मुँह देखना पड़ा ! इस युद्ध का वर्णन गुजरात के अनेक इतिहासकारों ने अपनी पुस्तकों में किया है, जिनमें मुख्य हैं – नर पटाधर नीपजे, सौराष्ट्र नु इतिहास के लेखक शम्भूप्रसाद देसाई, Bombay Gezzetarium Published by Govt of Bombay, विभा विलास, यदुवन्स प्रकाश की मवदान जी रतनु आदि में इस शौर्य गाथा का वर्णन है !

भान जी दल जाडेजा ने इसके बाद सम्वत 1648 में भूचर मोरी में मुगलों के विरुद्ध अपना अंतिम युद्ध लड़ा | इस युद्ध में अपना पराक्रम दिखाते हुए वे शहीद हुए ! सच में भान जी दल जाडेजा का नाम इतिहास में एक महान योद्धा के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है !

Bhuchar Mori Shaheed Van

Bhuchar Mori war was in 16th century. Memorial site located in Dhrol, Gujarat. This place was maintained / Governing by Buchar Mori Shahid Smarak Trust. This is also protected monument of the archaeological department of the state (S-GJ-84). Latest memorial was commissioned by Government of Gujarat, headed by Narendra Modi in year 2007 and completed in year 2015.

Jam Ajaji statue at Bhuchar Mori inaugurated in 2015 and Shahid Van was inaugrated in 2016 by Chief Minister Vijay Rupani in 67th Van Mahotsav in Gujarat.

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